धार्मिक राष्ट्रवाद की ओर बढ़ता विश्व🌵(महत्वपूर्ण)

 ...............पहले हम राष्ट्रवादी हुआ करते थे ,लेकिन अब हम धर्म प्रचारक और राष्ट्रवादी की मिली जुली संगत के साथ आगे बढ़ रहे हैं मामले ज्यादा पुराने नहीं है फिर चाहे तुर्की में हागिया सोफिया हो, भारत का राम मंदिर या फिर अमेरिका में  राष्ट्रपति Trump द्वारा बाइबल पर कसमें खाना हो! और विश्व के बहुत से देश और नेता इस बदलाव में अपनी भागीदारी देने के लिए उत्तेजित हो रहे हैं!

कुछ दशकों पुरानी ही बात है जब विज्ञान नामक विचारधारा अस्तित्व में आई थी तब पूरा विश्व इसके आगे झुकने को मजबूर था और विज्ञान खुद  भी सब को झुकने के लिए मजबूर कर रहा था इससे पहले लोग धर्म को ही  अटल सत्य मानते हैं लेकिन जब  विज्ञान अस्तित्व में आया और चीजों के पीछे के सत्य को उजागर करने लगा लोगों को और विश्व को समझदारी की एक नई रोशनी दिखाने लगा सब लोगों ने इसके महत्व को गंभीरता से लिया और समझा फिर एक समय आया और यह विज्ञान धार्मिक क्रियाओं पर हावी होने लगा अब लोग धर्म के झूठे प्रचार ओ से बचना चाहते थे वह हर एक चमत्कार के पीछे विज्ञान ढूंढते थे वे अपनी बुद्धि को यह विश्वास दिलाना चाहते थे कि चमत्कार जैसा कुछ नहीं होता विज्ञान का तो पहला सिद्धांत है चमत्कार को सामाजिक भलाई के रूप में बदलना उस चमत्कार का और उसके पीछे के विज्ञान को समझना तथा उसी चमत्कार का उपयोग विज्ञान में करके लोगों की जिंदगी को सहज बनाना! इसी बदलाव से दुनिया को और विश्व के लोगों को अपनी सोचने और समझने की शक्ति को बढ़ाने का मौका मिला और लोग धर्म की चमत्कारिक दुनिया से मानवता की वैज्ञानिक दुनिया में लौटने लगे!
 धीरे-धीरे लोग धर्म के चमत्कार के सहारे ना बैठ कर खुद के माध्यम और जीवन को सरल बनाने वाली खोजो पर ध्यान केंद्रित करने लगे और आज किसी को उदाहरण देने की जरूरत नहीं की विज्ञान ने दुनिया को किस हद तक बदल दिया है अब तो शायद हम उस अब वैज्ञानिक युग की कल्पना भी ना कर पाए!
 लेकिन सोचने योग्य क्या है धर्म के उस चरमंत पर पहुंचकर हम फिर वहां से लौटने को क्यों अग्रसर हो रहे हैं और हम उस तरफ लौटने के लिए बहुत अग्रसर दिखाई दे रहे हैं, शायद इस बात  की सच्चाई हमारे राजनेता अच्छी तरह समझ चुके और वह इस बदलाव को अपने अवसर के रूप में परिवर्तित करने के लिए पूरी तरह तैयार बैठे हैं इसी का उदाहरण मैंने आपको शुरुआत में ही हागिया सोफिया, राम मंदिर, बाइबल का जिक्र करके दे दिया था!
 जहां तक धर्म की बात करें या धार्मिक क्रिया और अनुष्ठानों की बात करें तो वह हमें सिर्फ और सिर्फ
 एक मर्यादित -धार्मिक सात्विक और सच्चा जीवन जीने का मार्ग दिखाते हैं (धर्म) यही  धर्म की व्याख्या हर एक धर्म पर लागू होती है! सोचने योग्य बात है कि क्या धर्म हमें जीवन जीने के तरीके के साथ-साथ जीवन जीने के लिए आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति करवा सकता है!
 जीवन जीने के लिए आपको निम्न चीजों की जरूरत है जिम में मूल्यता खाना , कपड़ा ,मकान शामिल है और आप सभी को पता है इन वस्तुओं को मुफ्त में प्राप्त करने का कोई माध्यम हमारे इन धार्मिक ग्रंथों- में फिर चाहे वह हिंदू धर्म के ग्रंथ हो, इस्लाम के ग्रंथ हो ईसाईयों का  ग्रंथ हो, यह दुनिया का अन्य कोई धर्म और उसके ग्रंथ है,  नहीं बताया गया है! और ऐसा भी मुमकिन नहीं कि हम सिर्फ एक सच्चे और धार्मिक जीवन आचरण से जीवित रह सकें क्योंकि जीवित रहने के लिए इन तीन
( खाना कपड़ा मकान) चीजों का होना और उपयोग करना आवश्यक है!
 और इस वक्त पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ती दुनिया मैं जीने के लिए आपके पास जीवन को सरल तरीके से जीने के लिए तथा एक अच्छा और स्वस्थ जीवन जीने के लिए एक पर्याप्त मात्रा में धन होना अति आवश्यक है वरना जीते जी कि आपका अस्तित्व इस दुनिया से खत्म हो जाएग
 और इस बदलाव को भी हमारे समाज के राजनेता भली-भांति समझ चुके हैं और वह धीरे-धीरे अपने धन की मात्रा हर किसी से ज्यादा कर लेने की होड़ में आगे बढ़ रहे हैं और उनके लिए इसका सबसे सुगम  मार्ग है राजनीति जो उन्हें उनका खजाना बढ़ाने में पूरी तरह मदद कर रही है! और देश और विश्व की आम जनता इनसे उलट इन्हीं के बहकावे में आकर धार्मिक मार्ग की ओर बहुत तेजी से लौट रही है यह राज नेता लोगों को उनके सही मार्ग से भटका रहे हैं और खुद सही मार्ग पकड़ कर परिस्थितियों के अनुकूल निर्णय लेकर आगे बढ़ रहे हैं!  और हम इस धार्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए इतने अग्रसर हैं की इसके लिए हमने कट्टरपंथ और जिहाद को अपना सबसे बड़ा हथियार बना रखा है कट्टरपंथ और जिहाद इनका एक ही मकसद है मानवता को मिटाना यानी कि निर्दोष लोगों की हत्या करना!
सूचना हमें और आपको हैं की ---
           !  मानवता जरूरी है या धर्म?


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